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दिल फिर से जीने को मचलने लगा है

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दैनिक भास्कर में एक ओशो प्रेमी के भाव ने भाव-विभोर इस कदर किया लगा मानो इसी समय मुझे संबल के लिए ही मेरे भाव को शब्द मिल गए जो शेयर कर रही हूँ आपसे…………….
तूने डाली है करुणा कि ऐसी नज़र,कि मेरा गीत निखरने लगा है
भवन जीवन का बन गया था खंडहर,तेरे इरादों से फिर संवरने लगा है
सब दिशाओं में मच रहा था बवंडर,तेरी हूक से सब कुछ ठहरने लगा है
मैं घिर गया था घोर तमस में,तेरी वाणी से पथ झिलमिलाने लगा है
चल दिया था मैं भी बनने सिकंदर,भीतर ध्यान का दिया जलने लगा है
मेरा दिल बन गया उदासी का समन्दर,तूने गुदगुदाया तो रोम-रोम महकने लगा है
दुखों ने बनाया मौत का तलबगार इस कदर,बनें जो नीलकंठ तुम
दिल फिर से जीने को मचलने लगा है1010

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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

nishamittal के द्वारा
July 21, 2012

बहुत सुन्दर भाव और चित्र शिरोमणि जी.


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