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कल-कल बहती छल -छल बहती

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बहुत मैं घूमा,पर्वत-पर्वत,नदी घाट पर खूब नहाया
और पिया तीरथ का पानी,आग नहीं मन की बुझ पाई
बहुत नवाया मैंने माथा,मंदिर और मजारों पर भी
खोज न पाया अपने मन का चैन जरा भी
रेगिस्तानों में चलकर के,दूर गया मैं सूनेपन तक
आग मिली बस आग मिली थी
मैं लौटा सब फेंक फांक कर,भगवा चोला और कमंडल
और खोजने की बैचैनी, उन सबको जो नहीं पास थे पहले मेरे
मैं घर लौटा आकर बैठा था आँगन में
टूटी खटिया पेड़ नीम का,बिटिया आई दौड़ी-दौड़ी
दुबकी गोदी में वह आकर
पत्नी आई सहज भाव से और छुआ मुझको धीरे से
बरस पड़ी जैसे शीतलता और चांदनी भीनी-भीनी
मेरे छोटे से आँगन में
मैं मूरख था अब तक भटका बाहर-बाहर
झांक न पाया था भीतर मैं
पावन मंदिर तीर्थ जहाँ था
और जहाँ थे ऊँचे पर्वत
शीतल-शीतल और भावना की नदियाँ थी
कल-कल बहती,छल-छल बहती

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Mohinder Kumar के द्वारा
July 3, 2012

शिरोमणी जी, आपने सत्य लिखा कि जीवन का आनन्द अपने दायित्वों को निभाते हुये घर के आंगन में ही है जहां परिवार के साथ एक आत्मिय सुख की अनुभूति होती है. जिसे हम पाना चाहत हैं वह तो हमारी आत्मा के रूप में हमारे अन्दर ही बसा हुआ है… उसे बाहर तलाशना व्यर्थ है…. लिखते रहिये.

    shiromanisampoorna के द्वारा
    July 3, 2012

    आदरणीय भाई जी, सादर श्री राधे धन्यवाद


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