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अनमोल धरोहर अवश्य हो जायेगें.............................

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DSC_1760वह कितना महान क्षण था जब शुरू किया
मैंने तुम्हे अपने भीतर महसूसना
वही जीवन का चरम था
मन में कुछ विस्वास जागा
श्रद्धा का आभास जागा
भावना निर्मल बनी तो कर दिया मन ने समर्पण
हाथों से प्रसून अर्पण,हो उठी साकार मेरी साधना
मृदुल चितवन की तूलिका को,भावना की स्याही में डुबोकर
ह्रदय- पृष्ठ पर जो हस्ताक्षर तुमने अंकित किये थे
स्मृतियों की मञ्जूषा में आज भी वे संचित है
पल हर पल पुराने होते ये दिन बीते दृश्यों के साथ,
ऐतिहासिक शिल्पकलाओं दस्तावेजों की तरह अमूल्य होते चले जायेगें
तुम्हारे साथ गुज़ारे थोड़े से सुन्दर,सुख भरे दिन शायद कभी लौटकर नहीं आयेगें
परन्तु मेरे लिए इस जग की “अनमोल धरोहर अवश्य हो जायेगें”

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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
June 19, 2012

परम पूज्य परम आदरणीय वात्सल्य से भरी दीदी माँ श्री ऋतंभरा जी के दर्शन मुझे प्रथम बार तब हुए थे जब मैं सिर्फ १२ साल का था उअर ७ वीं या ८ वीं में पढता था , तब से आज तक उनके दर्शनों के बिना भी उनकी कृपा हो रही है ! ऐसी पूज्यनीय दीदी माँ के चरणों में आपने जो शब्द दिए हैं , आल्हादित करते हैं ! बहुत सुन्दर शब्द !


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