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जब पादुका तुम्हारी,सांसों का स्पंदन मेरी नस-नस में घोले

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111111जब भी कोई झोंका आकर,दुआरे को उड़का जाता है
खड़ी देखती रह जाती हूँ,जाने कैसा नाता है
तिमिर मुक्ति का मार्ग पूछने,दुआर तुम्हारे आई थी
जनम-जनम की अतृप्त प्यास को,भाव शून्य बन लाई थी
अकस्मात पैरों को छूने क्यों और कैसे विवश हुई थी
रोक लेती इस विवशता को तो जनम-जनम कुंठित रह मैं जीते जी मर जाती
धनी हुई जब पादुका तुम्हारी,सांसों का स्पंदन मेरी नस-नस में घोले
जो कुछ होना हुआ,उसे तो मैंने स्वीकार किया
कितनी बार सोचा मांगें जो कुछ मन भाता है
परन्तु भरता वाही पात्र है जिसमें भरने को कुछ रह जाता है
मन मैं हूँ विवश मगर,तुम तो हो बंधन के पार,कहीं फेर पाती मन तुमसे
जीना व्यर्था समझ लेती

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

चन्दन राय के द्वारा
June 16, 2012

शिरोमानिसम्पूर्ण जी , आप सायद रिदाम्बरा जी की अनुनायी और शिष्य है , आपकी फुरुभक्ति और श्रद्धा सचमुच अतुलनीय है

shiromanisampoorna के द्वारा
June 16, 2012

आदरणीय सुधिजन , सादर श्री राधे टायपिंग मिस्टेक सुधार कर पढने की कृपा करें -धनी के स्थान पर धन्य ,वाही के स्थान पर वही और मन के स्थान पर माना


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