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और जीत गई वो जिंदगी से जिंदादिली की जंग..................

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वर्ष २०१२ के आगमन की बेला में मन ने बिहारी जी के दर्शन की उत्कंठा पैदा कर दी/वैसे थोडा संकोच भी हो रहा था लम्बे समय से श्री वृन्दावन की पावन धरा में वास करने का पावन सौभाग्य प्राप्त हुआ पर बिहारी जी के मंदिर जा दर्शन और पूजन का अवसर अपनी हठधर्मिता के कारण नहीं प्राप्त कर पाई और जब इस बात का आज अहसास हो ही गया तो सोचा देर आये दुरुस्त आये अपनी गलती सुधारने का इससे ज्यादा सुनहरा अवसर और दूसरा नहीं हो सकता/तेज क़दमों से वृन्दावन की कुंज गलियों से गुजरते हुए बिहारी जी के मंदिर कब पहंच गई पता ही नहीं चला टकटकी लगा बिहारी जी के भव्य स्वरूप के दर्शन से अंतर तृप्ति का महाप्रसाद पा ही रही थी कि तन्द्रा भंग हुई अपने बाजू में एक सावली सलोनी युवती की सिसकियों से,देख आंसुओं से तर-बतर चेहरा आँखे बंद, होंठ कुछ अरज कर बुदबुदा रहे रोक नहीं पाई खुद को,दोनों हाथों ने उसके कन्धों को झकझोर दिया/मुझे लगा भक्ति की लगन अपने आराध्य चरणों को अपने आंसुओं के जल से धोती है/जिज्ञासावश उस तरुणी से कुछ परिचयात्मक नजरे इनायत की और हम मंदिर से बाहर की ओर चल दिए ऐसा लगा मानों बिहारी जी ने मुझे आज मंदिर बुलाया ही इसलिए था/मंदिर के परिसर से गलियों तक आवाजाही और होते शोर ने हम दोनों को बोलने का कोई भी अवसर नहीं दिया मैंने युवती का हाथ पकड़ उसे मीरा मंदिर की ओर ले चली/मंदिर में एक किनारे बैठ शब्द प्रस्फुटित हुए,मैं अवाक् युवती को सुनती और बुनती रही उसीकी जुबानी सुनिए उसकी सत्यकथा -
देश के ह्रदय-स्थल के प्रदेश में मध्यम स्तर के परिवार में चार भाई-बहिनों के बीच जन्मी-पली-बड़ी मै [आरती] बचपन से अपने भाई-बहिनों में आचार-व्यवहार और खेल-कूद में अलग ही रही/मुझे धार्मिक बातें सुनना-पढना अच्छा लगता था कभी दादी के पास जाकर उन्हें रामायण पढकर सुनाती,कभी दादा जी की पूजा को छुपकर देखा करती/स्कूल/कालेज की पढाई पूरी हो गई सपने देखा करती मैं तो किसी भगवाधारी सदगुरू के सानिध्य में साधनारत/स्कूल-कालेज मार्ग में विवेकानंद आश्रम की ओर मेरे कदम रुकजाया करते और भीतर जाने का मन करता इसी बीच माँ का स्वास्थ्य ख़राब हुआ और उपचार के लिए विवेकानंद आश्रम रामकृष्ण मिशन में माँ के साथ जाने का अवसर मिलने लगा मानों मन की मुराद पूरी होने लगी/माँ को उपचार के लिए देर तक रहना होता था और मेरा खिचाव आश्रम परिसर में स्थापित श्री रामकृष्ण जी की मूर्ति की और होता था,वहां मुझे अदभुत सुकून और शक्ति मिलती,वो मूर्ति मुझसे बातें करती माँ के उपचार के बाद भी वहां जाना मेरा निरंतर जारी रहा इसी बीच मुझे शासकीय नौकरी भी प्राप्त हो गई साथ ही साथ मैंने उच्च अध्ययन भी पूरा किया लेकिन मन की रिक्तता भरी नहीं थी मुझे कुछ और की तलाश थी जो मेरे सपने में दिखता था/ऐसा लगता था मुझे कहीं जाना हैं लेकिन अभी वक्त नहीं आया जाने का मेरी अनवरत प्रतीक्षा जारी रहीं/
बारह वर्षों की लम्बी प्रतीक्षा की घडिया समाप्त हुई और मेरा बुलावा आ गया गुरु घर से जिसके लिए मै तड़फ रही थी-दौड़ी-दौड़ी पहुंची उन आराध्य चरणों में दर्शन और साक्षात्कार उपरांत मुझे शिष्य की दीक्षा मिलने की अनुमति गुरु से प्राप्त हो गई अब बारी थी तो,माँ-पापा को मनाने-तैयार करने की क्योकि बात थी मेरे पूरे जीवन की,समर्पण के साथ सुरक्षा और संरक्षण की और मैंने यह इम्तिहान भी पास कर लिया/नौकरी से स्तीफा पापा के हाथों ही भेज दिया और उस पल की बेसब्री से राह देखते हुए सपनों को हकीकत का जामा पहना देख रही थी/
सारे सपने धराशाई हो गए एक-एक कर नहीं टूटें वरन बज्रपात हो गया/गुरु माँ-पापा और प्रभु से भी बढ़कर होता है अपने शिष्य को सन्मार्ग की ओर ऊगली पकड़कर ले जाता है/दुर्गुणों-दुर्व्यसनों से बचाते हुए प्रभु से जोड़ता है “गुरु तो पगडण्डी होता है प्रभु के मंजिल के मार्ग की”गुरु के चरणों में समर्पित होने से पहले मेरे मन में गुरु के लिए एक बहुत अच्छी सी कल्पना थी क्योकि मैंने हमेशा पड़ा और सुना था कि गुरु इश्वर के समान होता है, माता- पिता से बढकर होता है,हर वक्त शिष्य पर नज़र रखता है कि कहीं वो इश्वर के मार्ग से विचलित तो नहीं हो रहा,हर वक्त उसका ध्यान सत्य मार्ग की ओर प्रेरित करना होता है, शिष्य चाहे इश्वर विमुखी हो या नादान, क्रोधि हो, निंदक फिर भी उसे हर वक्त अपने करीब शरीर से ही नहीं दिल से भी जोड़कर रखता है ताकि वह भटक न जाये और सिर्फ उस समय तक नहीं कि जब तक वो उसके आस-पास हो बल्कि उस समय भी जब वो उससे किन्हीं कारणों से चाहे परिस्थितिवश या अन्य कोई भी कारणों से दूर चला गया हो ,गुरु अपने समर्पित शिष्य के लिए सदैव चिंता करते है,वो कहीं भटक न जाये इस बात से वो उनकी खोज-खबर लेते रहते है/
मैं प्रभु रामकृष्ण जी के सन्दर्भ में भी पड़ा था कि जब एक बार विवेकानंद जी उनसे नाराज होकर चले गए थे तो वो बैचेन होकर सबसे पागलों की तरह पूछते थे की क्या तुम मेरे नरेंद्र से मिले हो?वह कैसा है?किसी भक्त ने जब विवेकानंद जी के बारे में गलत जानकारी दी कि उसमें कोई संस्कार नहीं है,वह पिने लगा है/प्रभु रामकृष्ण इतना सुनते ही कहने लगते कि तुम झूठ बोलते हो मेरा नरेंद्र ऐसा कर ही नहीं सकता/अपने शिष्य के लिए इतना विश्वास और प्यार तो पत्थर में भी परमात्मा के दर्शन करवा देता है/प्रभु रामकृष्ण जी ईश्वर से प्रार्थना करने लगते कि हे… प्रभु एक बार मेरे शिष्य नरेंद्र को मेरे पास भेज दो या मुझे उसके पास भेज दो और अगर भक्त की बात सच हो भी तो मेरे शिष्य को मार्ग से भटकने मत देना प्रभु…………./मेरा शिष्य अपना सब कुछ छोड़ अपना जीवन मुझे समर्पित किया है और ओव आज परेशां सड़कों पर भटक रहा है मै कैसे चैन की नींद सो सकता हूँ ऐसा मार्मिक द्रष्टांत पड़ मेरा मन द्रवित हो उठता लगता कि लोग सच ही कहते है गुरु का प्रेम तो निस्वार्थ ही होता क्योकि वो तो शिष्यों को गड़ता है ऐसी ही अनगनन्त भावों और विचारों से भरी मै गुरु के दरबार में अपने आप को समर्पित करने पहुची/एक वर्ष के इस छोटे से काल में गुरु के दरबार के सप्त रंग और कलाबाजियों ने मेरा अंतर तक झकझोर दिया रह-रहकर कुछ पन्तिया ज़ेहन में गूंजती रही”आप करे तो रासलीला,हम करे तो करेक्टर ढीला”सारा आध्यात्म और भक्ति का रंग उतर गया लगा सबसे सच्ची पूजा और सुख तो अपने माँ-पापा की छाँव में अपने घोंसले में था,लेकिन अब इतनी हिम्मत और ताकत भी नहीं बची की लौटकर माँ-पापा के पास जाऊ और मेरी आखोने जो देखा,मैंने जो भोगा उसे बता पाऊ न ही उनकी अनुभवी जिंदगी से अपने दर्द को छिपा सकती हूँ भागकर बाँकेबिहारी की शरण में आई /
इतना कह वह युवती निस्तेज सी मुझे टकटकी लगा निहारने लगी मेरा रोम-रोम कपकपा गया पूरे शरीर में सिहरन सी होने लगी और देखते ही देखते मेरे चहरे पर चमक दौड़ आई और मुझे बिहारी जी ने अपने दर्शन के लिए आने का मकसद समझा दिया परमानन्द में गोते लगते हम दोनों वृन्दावन की कुञ्ज गलियों से हँसते-गुनगुनाते अपनी मंजिल को चल दिए………………../

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11 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

alkargupta1 के द्वारा
January 18, 2012

शिरोमणि जी , गुरु महिमा अपरम्पार है….गुरु ज्ञान के बिना हृदय चक्षु खुलते ही नहीं…..बहुत सुन्दर वर्णन ……|

    shiromanisampoorna के द्वारा
    January 18, 2012

    आदरणीया अलका जी, सादर श्री राधे आपने सच ही कहा है गुरु ज्ञान के बिना ह्रदय चक्षु खुलते ही नहीं………/ “सदगुरु तुम्हारी याद ने दीवाना कर दिया,ऐसी दिखाई झाँकी की मस्ताना कर दिया/ रहते हैं जलवे हर घडी नज़रों के सामने ,मस्ती का जाम आपने ऐसा पिला दिया” aapki pratikriya ने bhav jaga दिया aapko bahut-bahut sadhuvad……………./

yogi saraswat के द्वारा
January 18, 2012

शिरोमणि जी नमस्कार ! गुरु महिमा का बहुत ही अच्छा दृष्टांत और वर्णन किया है ! गुरु की महिमा का जितना बखान किया जाये उतना ही कम होता है

    shiromanisampoorna के द्वारा
    January 18, 2012

    आदरणीय भाई जी, सादर श्री राधे “न मिलते तुम अगर गुरुवर,न jane हम कहाँ जाते/ हमें वे आसरा पाकर,सताने गम चले आते / आपकी सुखद प्रतिक्रिया ने हमें उपरोक्त पंक्तिया कहने को विवश कर दिया,बहुत-बहुत साधुवाद…………../

January 17, 2012

शिरोमणि जी नमस्कार ! गुरु महिमा का बहुत ही अच्छा दृष्टांत और वर्णन किया है आपने। सच ही तो है बिन गुरु ज्ञान के मिटई न हिय के पीर…….गुरु की गुरुता का कोई मोल नहीं ! साधुवाद

    shiromanisampoorna के द्वारा
    January 18, 2012

    aadarniya bhai ji, सादर श्री राधे aapki सुखद प्रतिक्रिया के लिए साधुवाद……………./आपने सच ही कहा है,गुरु के ज्ञान से ही ह्रदय की पीर मिट सकती है/वैसे हाल तो ये है कि “मेरे सदगुरु की छवि ऐसी है,मोहे लागे मोहन जैसी”

के एल परुथी के द्वारा
January 17, 2012

कहते हैं कि गुरु - सच्चे गुरु को ढ़ूंढने में यदि एक पूरा जन्म भी लग जाए तो वह जन्म सफल  मानना चाहिए, लेकिन गुरु  पूरा होना चाहिए। पूरा से मतलब उसकी परमात्मा तक पहुँच हो।  जो दुनियावी करामातें दिखाता हो, शिष्यों के धन पर जीवन यापन करता हो, उसे पूरा गुरु नहीं  कहा जा सकता, चाहे  उसके पीछे  बहुत लोग लगे हुए हों। गुरु नानक साहिब के अनुसार गुर पीर सदाये, मंगन जाए ताकि मूल न लगिये पाये ।  घाल खाए किछ हत्थों दे, नानक राह पछाने से॥ यानि जो गुरु बन कर शिष्यों से मांग  कर अपना गुज़ारा करता है, कभी भी उसके पास नहीं जाना चाहिए।  वह पूरा गुरु  नहीं हो सकता। पूरे गुरु  की क्या पहचान है - जो अपनी मेहनत की कमाई खाता हो और अपनी कमाई में से कुछ दान भी करता हो। जितने भी पूर्ण संत हुए हैं -  नानक  देव जी, कबीर साहिब, रविदास जी आदि- सभी अपने और अपने परिवार के लिए कोई न कोई काम करते थे। पूर्ण संत कभी भी अपने शिष्य को संसार को त्यागने  की सलाह नहीं देते।  

    shiromanisampoorna के द्वारा
    January 17, 2012

    आदरणीय भाई साब,सादर श्री राधे, आपके मार्गदर्शन का बहुत-बहुत स्वागत हैं/

nishamittal के द्वारा
January 17, 2012

बहुत सुन्दर दृष्टांत के साथ आपने आस्था और गुरु महिमा को समझाया.शायद इसीलिये सच्चे गुरु को प्रभु से बढ़ कर महत्व दिया गया है.

    shiromanisampoorna के द्वारा
    January 17, 2012

    आदरणीया निशा जी, सादर श्री राधे, सुन्दर प्रतिक्रिया के लिए सादर साधुवाद……………………/

    kuldeep duggal के द्वारा
    January 17, 2012

    गुरु अपने शिष्यों को पहचान कर उन को अपने पास बुला कर नाम दे कर उनका जीवन को भी सफल करते हैं और उनको भगवान् के दर्शन भी करवाते हैं शिष्यों में इतनी ताकत नहीं होती के वेह गुरु की पहचान कर sake


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